[नोहर तेज़] हस्तकला का जीवंत उदाहरण रखने वाले मिट्टी से बने बर्तनों की बात कि जाये तो नोहर का नाम पहले लिया जाता है। यहां के मिट्टी से बनी हांडी,सुराही, परात,कुल्हड़, कुंडी इत्यादि बर्तनों के अलावा बच्चों के गुल्लक, दीये, खिलौने, गमले, चूल्हे भी प्रसिद्ध है। इन सब में खास पहचान रखते है मिट्टी के मटके जिनकी प्रसिद्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जाता जा सकता है कि यहां बने मिट्टी के मटके नोहर के अलावा बाहर भी बहुतायत जाते है। इसके अलावा यहां आने वाले प्रवासी भी मिट्टी के इन मटको को यहां से खरीद कर ले जाते है। गर्मियों के दिनों में तो मटको की बिक्री पूरी परवान पर रहती है। कुंभकार द्वारा मिट्टी से बनाये गये इन मटको जिन्हें स्थानीय भाषा में माट भी कहा जाता है को लोग पूरे चाव से खरीदते है। मंहगाई का असर इन मटको पर भी पड़ा है। एक मिट्टे के मटके की कीमत करीब अस्सी से सौ रुपये की होती है। वर्तमान आधुनिकता के चलते जहां घर-घर में फ्रीज, वाटर कैम्पर इत्यादि ने ठंडे पानी के लिए जगह बना ली है वही आज भी इन मिट्टी के मटको का महत्व कम नही हुआ है। आज भी लोग मिट्टी से बने मटको का पानी पीकर काया को तृप्त मानते है।ऐसे बनते है मिट्टी के बर्तन
यहां के मिट्टी के बर्तनों की विशेषता का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि कुंभकार पहले चिकनी मिट्टी लाता है फिर उसे पानी में भिगोता है, जब मिट्टी पूरी तरह भीग जाती है तो उसे चाक की सहायता से विभिन्न प्रकार के मिट्टी के वस्तुओं जैसे मटके, गमले,हांडी,सुराही, परात, कुल्हड़, कुंडी,बच्चों के गुल्लक, दीये इत्यादि की आकृति देता है। वस्तुए बनाकर सुखाता है। सुखने के बाद उसे भट्टी (न्याहाई) में पकाता है। पूरी तरह मिट्टी के बर्तनों के पकने के बाद उनका विक्रय किया जाता है।
गोगामेड़ी मेले में भी सजता है इनका बाजार
मिट्टी से बने इन बर्तनों का बाजार गोगामेड़ी मेले के दौरान भी सजता है। जहां आने वाले श्रद्धालू भी इनकी जमकर खरीददारी करते है। इन मिट्टी के बर्तनों में मटके अपनी खास पहचान रखते है। श्रद्धालू यहां से बड़ी मात्रा मटके व अन्य मिट्टी के बर्तन क्रय करके ले जाते है।
मटके का पानी स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम
मिट्टी से बने मटके का पानी सेहत के लिहाज से बहुत फायदेमंद है। आज भी लोग इन्ही मिट्टी के मटको से पानी पीते है। मानना है कि गरीबो का फ्रीज कहे जाने वाले मिट्टी के मटके में ऐसे गुण होते है जिनके कारण पानी में मौजूद विषेलै पदार्थ अवशोषित कर पानी को शुद्ध करते है। आज भी अनेक घरो में पानी पीने के लिए मटको का इस्तेमाल किया जाता है। अनेक बुजृगों ने मटके पानी को स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान बताया।
नोहर के मटको की खास जगह प्रवासियों में
नोहर में बने मटको को देश के कोने-कोने में बसे प्रवासी जब भी यहां आते है यहां से इन मटको अपने साथ ले जाना नही भूलते है। मटके के पानी की खासियत के साथ-साथ उन्हें मटके पानी के माध्यम से जन्मभूमि की माटी की सौंधी खुशबू की अनुभूति भी होती रहती है।
कस्बे में यहां बिकते है मिट्टी के बने बर्तन
कस्बे के पूराना पुलिस थाना के पीछे, भगतसिंह चौक, धक्का बस्ती, सोनड़ी बस स्टैण्ड, पुराने साहवा अड्डा, पुराना पुलिस थाना के पास आदि ऐसे स्थान है जहां मिट्टी के बर्तनो की दुकाने सजी है। जहां से अपनी जरूरत के अनुसार लोग खरीददारी करते है। गर्मियों में तो इन दुकानों पर मटको की खरीददारी करने वालो की खासी भीड़ रहती है।
कई पीढ़िया कर रही काम
कई पीढ़ियों से काम कर रहे अनेक कुंभकारों ने बताया कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि बदलते समय के साथ इनकी बिक्री में भी कमी आई है। पूर्व में मिट्टी के बर्तनों की बिक्री इस कदर होती थी कि पूरे वर्ष भर मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य जारी रहता था। ग्रामीण क्षेत्रो में भी पहले के मुकाबले मिट्टी के बर्तनो का उपयोग कम होने लगा है।
कई दशकों से इस धंधे में जुड़े अनेक कुंभकारों ने बताया कि नोहर क्षेत्र की काली मिट्टी बर्तनों के लिए काफी उपयोगी है । परन्तु वर्तमान में प्लास्टिक व अन्य नुकसानदेह धातुओं के बर्तनों ने न केवल हमारी आजीविका के सामने संकट पैदा किया है बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण के सामने भी संकट पैदा किया है।
अब नहीं है पहले जैसा काम
कुंभकला पर आधुनिकता की दखल कुंभकारों के लिए चिंता का सबब बन गयी है। दीपावली का त्योहार नजदीक आते देख इस कला से जुड़े लोगों में उदासी व्याप्त है। कुंभकार का पुश्तैनी धंधा आधुनिकता की चकाचौंध में छिन्न-भिन्न होकर रह गया है। जिससे उनके चेहरों पर अब पहले जैसी रौनक नही दिखती। अब पहले जैसा काम नही रहा है।


