होली के बाद का सन्नाटा: रंगों की चकाचौंध से वास्तविकता तक
होली, जो रंगों का त्योहार है, एक पल के लिए समाज में बंधनों को तोड़कर सभी को एकसाथ कर देती है। गिले-शिकवे धुल जाते हैं, चेहरे रंगों से सराबोर हो जाते हैं और हर कोई उत्साह में डूबा नजर आता है। लेकिन जैसे ही यह त्योहार खत्म होता है, बाजारों में सन्नाटा छा जाता है, गलियों की रौनक फीकी पड़ जाती है, और समाज फिर से अपनी पुरानी व्यवस्था में लौट आता है।
रंग जो बिखर गए, पर निशान छोड़ गए
होली के दिन लोग जमकर रंग खेलते हैं, लेकिन यह रंग सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहते, वे दिलों में भी गहरे उतर जाते हैं। किसी के लिए यह खुशी का त्योहार होता है, तो किसी के लिए यह असहजता का। गरीब तबके के लिए यह दिन उनके संघर्षों से कुछ पल की राहत लेकर आता है, लेकिन त्योहार बीतते ही उनकी जिंदगी फिर से उसी संघर्ष में लौट आती है।
कई बार देखा जाता है कि त्योहारी उत्सव के दौरान लोग समानता की बातें करते हैं, लेकिन अगले ही दिन वही वर्गीकरण और भेदभाव लौट आता है। समाज की यह दोहरी मानसिकता उस सन्नाटे की तरह है, जो होली के अगले दिन बाजारों में छा जाता है।
कुछ दाग अच्छे भी होते हैं?
होली के रंगों से कपड़े दागदार हो जाते हैं, लेकिन कई बार यही दाग हमें एक नया नजरिया दे जाते हैं। त्योहारों के बाद समाज के उन पहलुओं पर सोचने का समय होता है, जो हमें साल भर दिखते तो हैं, लेकिन जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता। सेवा भारती जैसे संस्थान जब होली के बाद दान में मिले कपड़ों को जरूरतमंदों तक पहुँचाते हैं, तो शायद उन दागदार कपड़ों का सही उपयोग हो जाता है। यह दाग एक नई रोशनी लाते हैं, जो यह सिखाते हैं कि उत्सव का असली उद्देश्य सिर्फ खुशी मनाना नहीं, बल्कि उसे दूसरों तक भी पहुँचाना है।
अब क्या करें—पुराने रंग में लौटें या नया रंग चुनें?
होली बीत गई, अब लोग वापस अपनी दिनचर्या में लौटने वाले हैं। लेकिन क्या हमें फिर से वही पुराने सफेद-स्याह रंगों में लौट जाना चाहिए? या इस बार कुछ नया सोचना चाहिए? क्यों न होली का यह जोश, यह उमंग सिर्फ एक दिन का न होकर हर दिन की जिंदगी में शामिल हो?
निष्कर्ष
होली के बाद का सन्नाटा सिर्फ बाजारों तक सीमित नहीं होता, यह हमारे अंदर भी बस जाता है। त्योहार हमें एकता का संदेश देते हैं, लेकिन अगर हम इसे केवल एक दिन तक सीमित रखेंगे, तो इसका असली अर्थ अधूरा रह जाएगा। अब समय आ गया है कि हम अपने पुराने रंगों से बाहर निकलें और समाज को एक नई दिशा में रंगने की कोशिश करें—ऐसे रंग में, जो कभी फीका न पड़े।
तो क्या आप तैयार हैं, अपने अंदर के सन्नाटे को तोड़ने और एक नई सोच अपनाने के लिए?

